Saturday, November 18, 2017

हवाएँ कुछ ऐसे बदलीं ...

असली चहरे पहले भी कहाँ दिखते थे
कि इक और मुखौटा पहना दिया
दिलों में प्रदूशन की क्या कमी थी
की जो हवाओं में भी फैला दिया
रोज़ घुट के मरने के ज़रिए तो काफ़ी थे
क्यों साँसों को ही ज़हरीला बना दिया
दौड़ धूप से तो वैसे ही छुपते फिरते थे
क्यों घर की चारदीवारी में क़ैद करा दिया ।

- संजय धवन
November 2017

😞

Monday, September 4, 2017

कल


कल

पीछे मुड़ के देखो तो एक कहानी नज़र आती है ज़िन्दगी
बीता दर्द इक बेदर्द मुस्कान बन हाथ हिलाता है
वो हवा ही क्यों भाती है जो दूर गुज़र जाती है
जो है नहीं उसके होने का अहसास क्यों विश्वस्त है

आज के काँटे क्यूँ कटार बन काटते हैं
क्यूँ चुभते हैं वो कंकड़ जो अभी पाँव तले हैं
घड़ी की सुइयों के नीचे ही अंधेरा क्यूँ है
ऐसा अब ही क्यों हाथ जकड़े साथ चलता है

सड़क जो आगे है पहाड़ बन खिलखिलाती है
आने वाले मोड़ की ओझल झलक क्यूँ मन घबराती है
सुनहरे सपने सागर के उस पार ही क्यों पलते हैं
कल की आस में क्यूँ रुकी है दिल की धड़कनें 

आज की टिक टिक पे क्यूँ नहीं नाचती है ज़िन्दगी 
जो फिसल गई हाथ से वही क्यूँ सुहाती है ज़िन्दगी ।

- संजय धवन

Friday, June 9, 2017

लफ़्ज़



लफ़्ज़ कभी अपने आप फिसलते है
कभी बेख़ौफ़ उबलते हैं 
नहीं करते ग़ुलामी मेरी ख़ुदगर्ज़ 
कहाँ मेरे कहे किसी लकीर पे चलते हैं ?

कभी शर्माते हैं
नाराज़ ना हो तुम 
इस बात से घबराते है
निकलते तो है तेरी तारीफ़ की डगर में
मगर शर्माके घर लौट आते हैं ।

कुछ अधूरे लफ़्ज़ 
कुछ गिर के टूटे लफ़्ज़ 
कुछ क़लम की महीन नोक में अटके
तेरे दिल को खटखटाते बेबस लफ़्ज़ 

काश ये जाएँ तेरे पीछे
और बाँध लाएँ तुझे अपनी गिरफ़्त में
या खींचे तुम्हें दूर से ही 
चिल्लाएँ या गिड़गिड़ाएँ 
बहलाएँ या फुसलाएँ
बस मेरे आँगन ले आएँ ।

जुबान पे गुमसुम बैठे
ये कुछ ख़ामोश लफ़्ज़ ।

- संजय धवन